शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

आशा की किरण


दोपहर ढल रही थी

सांझ की चादर अपने पैर पसार रही थी

चूल्हे चौके में मां ने पानी से सना पोंछा जो फेरा

तो माटी की भीनी-भीनी खुशबू

मन मोह रही थी

लेकिन इसी बीच इठलाती-बलखाती काली घटाओं ने

दिन ने उजाले पर कब्ज़ा कर लिया

चारों और कारे-बदरा जम चुके थे

तेज़ हवाओं के साथ ज़ोर शोर से

बारिश भी आ धमकी

घर में सिवाय मां के सभी चिल्ला रहे थे

रात होने वाली है डिबिया में तेल खत्म होने से पहले

बिस्तर लगा लेना

मैं भी खटिया पर पड़ा आसमान को निहार रहा था

क्योंकि मेरी ज़िंदगी तो खाट पर ही सिमट कर रही गई थी

आसमान पर टिकी नज़रें देखकर मां बोली

हिम्मत रख

रात के बाद सुबह ज़रुर आती है

हमेशा की तरह होंसला बंधाती मां

नल के नीचे चौके की मिट्टी से सने हाथ

धोने लगी

तभी अचानक

पांडेय जी की मुंडेर पर

जोर का उजाला सा दिखाई दिया

मैं समझ न सका की आखिर ये क्या है

मां तेज़ी से उत्साह के साथ

खाट के तले बैठी और बोली

वो देख

पांडेय जी की छत पर उजाला

बादलों में घिरा सूरज

थोड़ी सी जगह चुराकर आखिरकार सामने आ ही गया

और रोशनी दे रहा है

अगर वो अंधेरे को चीरकर ऐसा कर सकता है

तो तू भी हिम्मत न हार

तेरी ज़िंदगी के अंधेरे में भी

रोशनी की किरण ज़रुर आऐगी

बस तू होंसला रख

हिम्मत रख...................

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