शनिवार, 10 मार्च 2012

सूबे का नया सुल्तान


उत्तर प्रदेश को एक नया सुल्तान मिल गया है ! सूबे की कमान एक नये सुल्तान ने थाम ली है ! छोटे कद का हंसमुख गेरुए रंग का ये सुल्तान बेहद शालीन है ! उत्तर प्रदेश की जनता ने भी इस सुल्तान को बेहद खुशी के साथ अपना लिया है ! लेकिन क्या ये सुल्तान जनता के साथ किये गये वादों को निभा पायेगा ?  क्या ये सुल्तान सूबे में नई जान डाल पायेगा ?  क्या ये सुल्तान उत्तर प्रदेश को एक बार फिर उत्तम प्रदेश बना पायेगा ? सवाल कई हैं राह भी मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं !
मुलायम के सबसे बड़े बेटे अखिलेश यादव को यूपी का मुख्यमंत्री चुन लिया गया है सिंहासन पाने के बाद अखिलेश ने सबसे पहले जनता को भरोसा दिया कि वो घोषणापत्र में किये गये सारे वादों को पूरा करेंगे! जनता को उनकी बातों पर यकीन भी है क्योंकि वो सूबे में उभरती हुई ऐसी शख्सियत हैं जिसने हार और जीत, दोनों से सबक लिया लेकिन शालीनता का दामन नहीं छोड़ा ! यूं तो इस नये सुल्तान का जन्म साल 1973 में हुआ था लेकिन सूबे की सियासत में अखिलेश ने साल 2000 में कदम रखा ! हालंकि इससे पहले अखिलेश धौलपुर के सैनिक स्कूल से शिक्षा पाकर मैसूर से एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल कर चुके थे ! सैफई के रहने वाले अखिलेश शिक्षा की चाह में सिडनी तक पहुंचे और फिर वहां से एनवायनमेंटल साइंस में मास्टर डिग्री हासिल कर वापस सैफई आए और पिता के साथ शुरु कर दिया साइकिल पर सवार होकर सियासत का सफर ! साल 2000 में अखिलेश पहली बार लोकसभा पहुंचे ! ये गौरव उन्हें दूसरी बार 2004 और फिर साल 2009 में कन्नौज से तीसरी बार हासिल हुआ ! बीतते वक्त के साथ अखिलेश अपने पिता से राजनीति की समझ हासिल करते रहे  लेकिन फिरोजाबद में लोकसभा के उपचुनाव में जब कांग्रेस के राज बब्बर के हाथों उनकी पत्नी डिंपल यादव को हार मिली तो इस हार ने अखिलेश को हिला कर रख दिया ! बस अखिलेश की जिंदगी में यही वो मोड़ था जहां से उन्होंने संकल्प के साथ साथ समाजवादी पार्टी की दशा दिशा और चेहरा तक बदल देने का फैसला लिया ! राजनीति की अग्निपरीक्षा में अखिलेश के लिए सबसे बेहतर बात ये रही कि पग पग पर उन्हें अपने पिता का तजुर्बा मिलता रहा ! सूबे में समाजवाद की लहर फिर से कायम करने के लिए अखिलेश ने क्रांति रथ निकाला ! सूबे की सड़कों पर कभी पैदल तो कभी साइकिल की सवारी निकाली और जनमानस में ये संदेश दिया कि समाजवादियों का नया सुल्तान उनके करीब है ! अखिलेश को इस बात का अहसास था कि समाजवादी पार्टी को गुंडों की पार्टी कहा जाता है लिहाजा सबसे पहले उन्होंने इस दाग को मिटाने का काम किया ! मायावती के बेहद करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी के छोटे भाई समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बाहुबली को पार्टी में शामिल न करने के फैसले पर उन्हें पार्टी महासचिव आजम खान की नाराजगी झेलनी पड़ी ! चाचा शिवपाल यादव की नाराजगी का भी उन्हें सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने रिश्तों को दरकिनार कर पार्टी की छवि निखारने की अपनी जिद को पूरा किया ! सूबे की जनता पर इस फैसले का बड़ा सकारात्मक असर पड़ा ! जिस तरह वो फैसले लेने में बेहद अडिग रहे उसी तरह से उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता का भी परिचय दिया! अमर सिंह ने जब उनपर शब्दों के बाण छोड़े तब भी अखिलेश ने यही कहा कि वो मेरे अंकल हैं और अंकल ही रहेंगे ! राहुल गांधी ने जब एक कागज को सपा का घोषणापत्र बताकर फाड़ा तब भी उन्होंने बेहद समझदारी से राहुल को दोस्ताना अंदाज में सलाह दी ! अखिलेश के इस अंदाज ने सूबे में उनकी समझदारी और शालीनता का संदेश दिया जो कि जनता के दिल में उतर गया ! जो पार्टी साल 2009 में अंग्रेजी और कम्प्यूटर की विरोधी थी उस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में टैबलेट और लेपटॉप बांटने का वादा किया! माया ने सूबे को बांटने का जो कार्ड खेला, समाजवादी पार्टी ने उसका पुरजोर विरोध किया ! कांग्रेस ने आरक्षण का जो दाव चला उसपर समाजवादी पार्टी ने आबादी के हिसाब से आरक्षण की चाल चल दी और जामा मस्जिद के शाही इमाम से पार्टी को वोट करने का ऐलान करवा दिया! ये सारी पहल अखिलेश के ज़रिये हुई ! पढे लिखे अखिलेश पर जनता ने भरोसा किया, उनकी शालीनता और समझदारी को गले से लगाया और वोट देकर समाजवादी पार्टी को सूबे में बना दिया नम्बर वन ! जनता ने अपना किया तो विधायकों ने उन्हें सूबे का मुख्यमंत्री चुन लिया ! यहां तक तो सब कुछ ठीक था लेकिन इसके बाद शुरु होगी अखिलेश की अग्निपरीक्षा और इस अग्निपरीक्षा में अखिलेश के सामने चुनौतियां कम नहीं ! उन्हें सूबे से क्राइम को कम करना है, पार्टी से गुंडा छवि का दाग मिटाना है, पूर्वांचल में जारी दिमागी बुखार का कहर खत्म करना है बुंदेलखंड की बदहाली दूर करनी है युवाओं को रोजगार के अवसर दिलाने हैं सूबे में शिक्षा का स्तर बढाना है कुपोषण को दूर भगाना है, घर घर में दोनों वक्त चूल्हा जलवाना है जाटलैंड में गन्ना किसानों को हक दिलवाना है तो भूमि अधिग्रहण जैसे कानून का मजबूत बनवाना है किसानों को बेहतर सुविधायें दिलवाना है, बिजली पानी और सड़क की दिक्कतों को दूर कराना है, औऱ सबसे अहम सूबे की जनता को ये अहसास कराना है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी को चुनकर कोई गलती नहीं की ! अखिलेश को राज्य की जनता के जहन में ये बात दाखिल करानी होगी कि वो उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाकर ही दम लेंगे ! अखिलेश में ये क्षमता है, उनके अंदर सूबे को विकास की डगर पर ले जाने की आग है, जरुरत है तो बस इस आग को धधकते रखने की और इसके लिए अखिलेश को अब से ही तय कर लेनी होगी रणनीति, अब से ही तय कर देनी होगी हर समाजवादी की जिम्मेदारी और वक्त वक्त पर करना होगा हर असाइनमेंट का आंकलन ! साथ ही अखिलेश को ये भी याद रखना होगा कि सूबे की राजनीति में उनका कुनबा भी उनके साथ है और अगर कहीं वो कुनबा कर्मभूमि में पीछे रह जाये तो वो उनके खिलाफ भी सख्त कदम उठा सकें क्योंकि कोई सुल्तान तभी जीत की कमान संभाल पाता है जब वो परिवारवाद से उपर उठकर जनहित, समाजहित और देशहित में सोचता है और अपनी जिम्मेदारी निभाता है ! अखिलेश की किस्मत अपना काम कर चुकी है अब वक्त  है कर्म का !

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रंधीव की नो बॉल- बिल्ली खायेगी नहीं तो फैलायेगी


श्रीलंका और टीम इंडिया के बीच 16 अगस्त को क्रिकेट का एक अहम मुकाबला हो रहा था… जो मैच टीम इंडिया की झोली से जाता दिख रहा था उस मैच को विरेन्दर सहवाग की तूफानी पारी ने बचा लिया....मैच टीम इंडिया की पकड़ में था....टीम इंडिया जीत की दहलीज तक पहुंच चुकी थी...इस जीत का मजा दोगुना होने वाला था क्योंकि विरेन्दर सहवाग भी अपनी सेंचुरी से महज एक रन की दूरी पर थे...श्रीलंकाई खिलाड़ी भी इस बात को बखूबी जानते थे कि मैच तो पूरी तरह हाथ से निकल ही चुका है अब अगर कुछ रोका जा सकता है तो सहवाग की सेंचुरी....अब इसे डर्टी गेम कहें या फिर सूरज रंधीव की अंजानी गलती...कि अगली बॉल नोबाल पड़ी जिसपर सहवाग ने छक्का जड़कर टीम इंडिया को जीत दिला दी.... श्रीलंकाई चीतों से ऐसी उम्मीद कम ही की जाती है कि वो इस तरह डर्टी गेम खेलेंगे....लेकिन ऐसा हुआ....हर किसी के जहन में केवल एक ही बात थी कि रंदीव ने ऐसा जानबूझकर किया लेकिन इस आखिरी बॉल का सच तो तब सामने आया जब स्टंप माइक के ओडियो को सुना गया....उस ओडियो के मुताबिक संगकारा ने रंधीव को कहा कि “ध्यान रखना अगर वह शॉट मारेगा तो उसे रन मिल जाएगा” इसके बाद अगली ही गेंद पर रंधीव ने नो बॉल डाल दी.... हालांकि संगकारा ने साफ तौर पर नो बॉल डालने के लिए तो नहीं कहा लेकिन उन्होंने इशारे ही इशारे में बहुत कुछ कह दिया था....मैच के बाद श्रीलंकाई कप्तान संगकारा ने कहा कि रंधीव जान बूझकर ऐसा नहीं कर सकता.... सहवाग भी वहीं मैच के बाद सहवाग पर प्रेस कांफ्रेंस में सूरज रंधीव पर जमकर बरसे....लेकिन इसके बाद जब स्टंप माइक के ओडियो को सुना गया तो संगकारा की असलियत सामने आ गई.... इसके बाद श्रीलंकाई बोर्ड के सचिव निशांत रणतुंगा ने भी भारतीय टीम के मैनेजर से फोन करके इस प्रकरण के लिए बोर्ड की ओर से माफी मांगी... श्रीलंकाई बोर्ड ने इस मामले में जांच के आदेश भी दिए.... लेकिन जरा सोचिये कि आखिर ये कैसा जेंटलमैन गेम था जिसमें श्रीलंकाई चीतों ने जैलेसी दिखाई....शायद इसी को कहते हैं कि बिल्ली खायेगी नहीं तो फैलायेगी...इससे बढ़के डर्टी गेम का उदाहरण कोई हो ही नहीं सकता....

शनिवार, 14 अगस्त 2010

ये कैसी आजादी !

देश आजादी की 64वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है.... लेकिन सवाल ये है कि आखिर हम आजादी को किस नजरिये से देखते हैं और उसे कैसे महसूस तरते हैं....मेरा मकसद ये नहीं कि आजादी की खुशियों के रंग में भंग डालूं..लेकिन इतना जरुर है कि मैं आपका ध्यान कुछ बातों की ओर आकर्षित करुं... पहली बात...ये बात है पश्चिम बंगाल के वीरभूम से...जहां एक आदिवासी लड़की को सभ्य समाज के कुछ समझदार ठेकेदारों ने नंगा कर सरेआम घुमाया....उस लड़की का कुसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने से ऊंची जाति के एक लड़के से मोहब्बत की थी...अब भला जात बिरादरी के लिहाज से ऊंचे समाज को ये बात कैसे गंवारा होती कि कोई नीचे तबके की लड़की ऊंची बिरादरी के लड़के से मोहब्बत कर सके...लिहाजा समाज के चंद ठेकेदारों ने उस लड़की को सुना दी मोहब्बत की सजा...और उसे सरेआम नंगा कर घुमाया गया....हजारों की भीड़ में वो लड़की नंगे बदन घूमती रही...लोग उस पर अश्लील फब्तियां कसते रहे... कुछ लोगों ने तो उसके जिस्म को सरेराह अपने नापाक हाथों से मसलने की कोशिश भी की लेकिन अफसोस कलियुग के इस चीरहरण में कोई कृष्ण पैदा न हुआ....हजारों की भीड़ में कोई ऐसा न था जो उसे तन ठकने के लिए दो मीटर कपड़ा दे देता...कोई ऐसा न था जो उसकी इज्जत को इंसानियत की इज्जत समझकर उसकी हिफाजत को आगे आता....सोचिये क्या यही है आजादी.....अब बात दूसरी बात करते हैं....देश में नक्सली आये दिन मासूम लोगों के साथ साथ सुरक्षा से जुड़े जवानों का खून बहा रहे हैं.... ये बात और है कि वो ये खून एक आंदोलन के तहत बहा रहे हों लेकिन सच तो ये भी है कि हमारे अपने ही राजनेताओं में से कुछ उन नक्सलियों को परदे के सामने आकर सपोर्ट कर रहे हैं तो कुछ परदे के पीछे....मसलन मासूमों के खून के एवज में वो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं...कोई नहीं जानता कि आजादी की सुबह का जश्न किसी नक्सली हमले की वजह से मातम में तब्दील न हो जाये...जरा सोचिये कि जिस देश में मासूमों का खून बहानों को अपने ही लोग उतारु हों...वहां भला कैसी आजादी....तीसरी बात....कश्मीर का सूरतेहाल देखिये....पूरा जम्मू कश्मीर गोलियों और नौजवानों के नारेबाजी से गूंज रहा है....अलगाववादी नौजवानों का सहारा लेकर राज्य में दंगे करवा रहे हैं... और बेचारे सुरक्षा जवान जिनके पास गोलियां चलाने के अलावा कोई चारा भी नहीं...या तो लोगों के पत्थर खाओ या फिर नौजवानों को खदेड़ने के लिए गोली चलाओ...गोली चली तो दुर्घटना होगी....और यही चाहते हैं कश्मीर के अलगाववादी..... राज्य से लेकर केन्द्र तक बैठकों के दौर चल रहे हैं लेकिन कश्मीर में शांति बहाली का कोई पुख्ता हल नहीं निकल रहा....सब जानते हैं कि सीमा पार बैठे देश के गद्दार राज्य में दंगे फैला रहे हैं...और इन दंगों में मरने वाले भी कोई और नहीं बल्कि कश्मीर के मासूम लोग हैं....अब जरा बताईये जिस देश का एक राज्य आग में जल रहा हो...जहां आये दिन कोई न कोई नौजवान मारा जा रहा हो...उस देश में आजादी को किस रुप में महसूस किया जाये और कैसे महसूस किया जाये....और अब बात करते हैं चौथी....जरा देखिये कि किस तरह विदर्भ में किसानों ने भुखमरी के कारण मौत को गले लगाने का रास्ता अख्तियार किया.... आये दिन किसी न किसी किसान का परिवार मौत की नींद सोने को मजबूर है...कभी पेट की भूख मार देती है तो कभी भूख से तडपता तन मौत को गले लगा लेता है... सोचिये हम आजादी का जश्न मनाने जा रहे हैं लेकिन हमारे ही देश में ऐसे भी लोग हैं जो आजादी के मौके पर भूखे पेट हैं....पता नहीं ये भूख कब उनके लिए मौत का सबब बन जाये....सोचिये क्या हम आजादी मनाने के हकदार हैं और अगर हैं भी तो कितनी खुशी के साथ.... मनाईये मनाईये आजादी की खुशियां मनाईये लेकिन एक बार इन बातों पर गौर जरुर करना...जय हिन्द, जय भारत

शुक्रवार, 4 जून 2010




मैं पहले मुफलिस था
और अब चोर बन गया हूं
लेकिन इस भरे बाज़ार से क्या चुराऊं
यही सब लुटा कर तो मैं मुफलिस बना था

मंगलवार, 18 मई 2010

गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी कमज़ोरी




रविवार १६ मई का वो दिन उनलोगों के जहन से नहीं मिट पायेगा जो नई दिल्ली पहुंचे तो इस आस में थे कि ट्रेन में सवार होकर अपने अपने घरों को पहुंचेंगे लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट...अंतिम समय में रेलवे अधिकारियों ने ट्रेन का प्लेटफार्म बदलने की घोषणा कर दी और बस इसके बाद पूरे स्टेशन पर अफरा तफरी मच गई....भेड़ बकरियों की तरह लोग एक दूसरे के ऊपर चढ़ आगे निकलने की कोशिश में जुट गये....जो एक बार गिरा दोबारा उठ न पाया....दो लोगों की मौत हुई ....दर्जनों घायल हुए...लोगों को उम्मीद थी कि इतने बड़े हादसे पर रेल मंत्री का कोई सहानुभूति भरा संदेश आयेगा....लेकिन यहां भी हुआ इसके उलट.....ममता ने तो पश्चिम बंगाल में ही बैठे बैठे बयान दे दिया कि जो भी हुआ इसके लिए खुद यात्री ही जिम्मेदार हैं....ममता जी ने लोगों को तो जिम्मेदार ठहरा दिया लेकिन शायद अपनी जिम्मेदारी भूल गईं.....राजधानी में हादसा हुआ लेकिन उन्हें दिल्ली आने की भी फुरसत नहीं....वजह राज्य में होने वाले चुनाव.....वहां भी ममता लोगों को सब्जबाग दिखाने में व्यस्त थीं कि वो और उनकी पार्टी उनके साथ हैं.....लेकिन लोगों को देखना होगा...समझना होगा कि जिस मंत्री के पास चुनाव के चलते इतने बड़े हादसे में मारे गये और घायल हुए लोगों के लिए समय नहीं है वो भला उनका भी क्या भला कर पायेंगी.....खैर ये तो बात थी लोगों के समझने की जो अक्सर चुनाव के दौरान ये बातें भूल जाते हैं और जिता देते हैं ऐसे नेताओं को लेकिन सवाल है कि आखिर केन्द्र में बैठे देश के बड़े बड़े अगुवाकार ममता के इस व्यवहार को नहीं देख पाते....आखिर उनकी आंखों पर भी क्या पट्टी बंधी है....असल में हिन्दुस्तान की राजनीति कुछ है ही इस तरह की जो ऐसे मंत्रियों के भी नाज नखरे उठाने को तैयार हो जाती है जो गठबंधन की कमजोरी होते हैं...और ममता का भी हाल ऐसा ही है....केन्द्र सरकार ममता के अड़ियल, गैर समाजिक और गैर जिम्मेदाराना रवैये का कभी विरोध नहीं कर पाई...वजह केवल गठबंधन सरकार की कमजोरी....कहीं ममता रुठी तो सरकार पर कोई आंच न आ जाये....सोचिये शशि थरुर और जयराम रमेश जैसे नेताओं की गलतियों पर तो सरकार उनसे मांफी भी मांगने को मजबूर कर देती है ...इतना ही नहीं जरुरत पड़ने पर मंत्रियों से मंत्रीपद से इस्तीफा तक मांग लेती है....लेकिन ममता जैसे नेताओं के लिए केन्द्र के पास कोई इलाज नहीं....असल में शशि थरुर और जयरामरमेश जैसे नेताओं का हिन्दुस्तान की राजनीति में कसूर इतना है कि वो वोट बैंक की राजनीति से कम बल्कि अपनी बुद्दिमता के लिए ज्यादा जाने जाते हैं .....ऐसे लोगों को सरकार एक गलती करने पर भी माफ करने को राजी नहीं....लेकिन ममता जैसे नेताओं की ओर तो शायद सरकार का ध्यान ही नहीं जाता....आखिर ममता के पास पश्चिम बंगाल में मजबूत वोट बैंक जो है....शायद इसी लिए कहा जाता है की दुधारु गाय की तो लात भी सह ली जाती है ...और शायद यही है गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी... जो उसी मासूम जनता के आंसुओं का भी ख्याल नहीं जो उसे सत्ता के गलियारे तक आने का टिकट देते हैं
आदित्य चौहान, प्रोडयूसर, इंडिया न्यूज़

शुक्रवार, 7 मई 2010

मैं मुम्बई हूं

मैं मुम्बई हूं


पानी सी रंगीन

भीड़ के बीच तन्हा

अपनों के बीच अकेली

खुशहाली में गमगीन



मेरी दहलीज पर जो भी आया

मैंने उसे अपने सीने से लगाया

किसी को दिया रोजगार

तो किसी को घर परिवार



उम्मीद थी कि मेरे चमन में खुशियां बसेंगी

गगन चुंबी होंसलों को कामयाबी मिलेगी

लेकिन ऐसा हो न सका



मेरे सीने पर एक के बाद

ज़ख्म ढाये गये

कभी गोलीबारी कर तो कभी बम ब्लास्ट कर

मेरे अपने ही मेरी आंखों के सामने बन गये

एक दुसरे की जान के दुश्मन

कोई जर के लिए

तो कोई जमीन के लिए



इस कदर मेरा सीना

जख्मों से हो चुका है छलनी

देखकर मुंह से आह निकल जायेगी

जख्म गिनते-गिनते उंगलियां छिल जायेंगी





अब तो सरहद पार के गद्दार

मुझे बना रहे हैं अपना शिकार

कभी ट्रेन में ब्लास्ट करते हैं तो कभी टैक्सी में



लेकिन इस बार तो हद ही हो गई



खुलेआम मेरे बच्चों के साथ खेली गई खून की होली

किसी का सुहाग गया तो किसी की सूनी हो गई झोली



देश दुनिया में चली बात

मिलेगा मेरे बच्चों को इंसाफ

गद्दारों को मिलेगी सजा

मैंने भी अब ये मान लिया था कि जख्म झेलना ही

शायद मेरे लिए है खुदा की रजा



और अब जब देश के गद्दार को

फांसी की बात देने की बात हो रही है

मैं सोचती हूं कि क्या मैं फिर से कुछ खो रही हूं

लेकिन ऐसा होना भी ठीक है

कम से कम देश के गद्दारों के लिए ये एक सीख है



बहरहाल मैं तो बस यही एक दुआ करती हूं

ए-खुदा तू मुल्क के किस्से भी हिस्से को

न देना ऐसी सजा

मेरा मुल्क गमों से रहे सदा जुदा

खुशियों से रहे हरा भरा



मैं मुंबई हूं

भीड़ के बीच तन्हा

अपनों के बीच अकेली

खुशहाली में गमगीन

हरियाली में वीरान...

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

आशा की किरण


दोपहर ढल रही थी

सांझ की चादर अपने पैर पसार रही थी

चूल्हे चौके में मां ने पानी से सना पोंछा जो फेरा

तो माटी की भीनी-भीनी खुशबू

मन मोह रही थी

लेकिन इसी बीच इठलाती-बलखाती काली घटाओं ने

दिन ने उजाले पर कब्ज़ा कर लिया

चारों और कारे-बदरा जम चुके थे

तेज़ हवाओं के साथ ज़ोर शोर से

बारिश भी आ धमकी

घर में सिवाय मां के सभी चिल्ला रहे थे

रात होने वाली है डिबिया में तेल खत्म होने से पहले

बिस्तर लगा लेना

मैं भी खटिया पर पड़ा आसमान को निहार रहा था

क्योंकि मेरी ज़िंदगी तो खाट पर ही सिमट कर रही गई थी

आसमान पर टिकी नज़रें देखकर मां बोली

हिम्मत रख

रात के बाद सुबह ज़रुर आती है

हमेशा की तरह होंसला बंधाती मां

नल के नीचे चौके की मिट्टी से सने हाथ

धोने लगी

तभी अचानक

पांडेय जी की मुंडेर पर

जोर का उजाला सा दिखाई दिया

मैं समझ न सका की आखिर ये क्या है

मां तेज़ी से उत्साह के साथ

खाट के तले बैठी और बोली

वो देख

पांडेय जी की छत पर उजाला

बादलों में घिरा सूरज

थोड़ी सी जगह चुराकर आखिरकार सामने आ ही गया

और रोशनी दे रहा है

अगर वो अंधेरे को चीरकर ऐसा कर सकता है

तो तू भी हिम्मत न हार

तेरी ज़िंदगी के अंधेरे में भी

रोशनी की किरण ज़रुर आऐगी

बस तू होंसला रख

हिम्मत रख...................