शुक्रवार, 7 मई 2010

मैं मुम्बई हूं

मैं मुम्बई हूं


पानी सी रंगीन

भीड़ के बीच तन्हा

अपनों के बीच अकेली

खुशहाली में गमगीन



मेरी दहलीज पर जो भी आया

मैंने उसे अपने सीने से लगाया

किसी को दिया रोजगार

तो किसी को घर परिवार



उम्मीद थी कि मेरे चमन में खुशियां बसेंगी

गगन चुंबी होंसलों को कामयाबी मिलेगी

लेकिन ऐसा हो न सका



मेरे सीने पर एक के बाद

ज़ख्म ढाये गये

कभी गोलीबारी कर तो कभी बम ब्लास्ट कर

मेरे अपने ही मेरी आंखों के सामने बन गये

एक दुसरे की जान के दुश्मन

कोई जर के लिए

तो कोई जमीन के लिए



इस कदर मेरा सीना

जख्मों से हो चुका है छलनी

देखकर मुंह से आह निकल जायेगी

जख्म गिनते-गिनते उंगलियां छिल जायेंगी





अब तो सरहद पार के गद्दार

मुझे बना रहे हैं अपना शिकार

कभी ट्रेन में ब्लास्ट करते हैं तो कभी टैक्सी में



लेकिन इस बार तो हद ही हो गई



खुलेआम मेरे बच्चों के साथ खेली गई खून की होली

किसी का सुहाग गया तो किसी की सूनी हो गई झोली



देश दुनिया में चली बात

मिलेगा मेरे बच्चों को इंसाफ

गद्दारों को मिलेगी सजा

मैंने भी अब ये मान लिया था कि जख्म झेलना ही

शायद मेरे लिए है खुदा की रजा



और अब जब देश के गद्दार को

फांसी की बात देने की बात हो रही है

मैं सोचती हूं कि क्या मैं फिर से कुछ खो रही हूं

लेकिन ऐसा होना भी ठीक है

कम से कम देश के गद्दारों के लिए ये एक सीख है



बहरहाल मैं तो बस यही एक दुआ करती हूं

ए-खुदा तू मुल्क के किस्से भी हिस्से को

न देना ऐसी सजा

मेरा मुल्क गमों से रहे सदा जुदा

खुशियों से रहे हरा भरा



मैं मुंबई हूं

भीड़ के बीच तन्हा

अपनों के बीच अकेली

खुशहाली में गमगीन

हरियाली में वीरान...

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